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जंग—ए—बर्रे बंगाल!

के. विक्रम राव, वरिष्ठ पत्रकार

 17/Mar/21

चोटिल ममता बनर्जी बोलीं : ''घायल शेरनी ज्यादा घातक होती है।'' अर्थात वे भाजपा को धमका रहीं हैं कि राज्य विधानसभा चुनाव में खराब नतीजों के लिये वे लोग तैयार रहें। वे झाल्दा (पुरुलिया) रैली में बोली: ''अगले कुछ दिनों में मेरे पैर के घाव तो ठीक हो ही जायेंगे। पर अब आप सोचिये कि बंगाल में आप लोग अपनी टांगों पर चल पायेंगे?'' (दि हिन्दू दैनिक, 16 मार्च, पृष्ट—10, कालमएक से चार)। उनके चुनावी उदगार थे : ''नरेन्द्र मोदी निकम्मे हैं। देश नहीं चला सकतें'' अमित शाह पर वे बोलीं : ''यदि गृहमंत्री प्रार्थना करते तो मैं अपने पार्टीजन को उनकी सभा में भेज देती। वह फीकी न रहती।'' ममता बनर्जी बोलीं कि विरोधियों को विश्वास था कि घायल होकर वे चुनाव अभियान से दूर हो जायेंगी। ''मगर वे अब समझ लें कि आखिरी सांस तक, लहू के अंतिम कतरे तक मैं लडूंगी। कदापि नहीं झुकूंगी। भले ही टूट जाऊं।'' तो यह हुयी गर्जना !

पर ममता दीदी द्वारा दर्द से कराहने पर अमित शाह बोले : ''आपको उन 130 भाजपायी कार्यकर्ताओं की माताओं के दिली दर्द पर कष्ट नहीं हुआ जिन्हें तृणमूलकांग्रेस के गुण्डों ने मार डाला था?''

ममता बनर्जी पर हमले को वरिष्ठ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नेता तथा पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा : ''ऐसे फर्जी किस्से ममता बनर्जी कई दफागढ़ चुकीं हैं।'' लोकसभा में सोनियाकांग्रेस विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा: ''ममता की यह सियासी नौटंकी है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है।'' हालांकि आंचलिक नेता अरविन्द केजरीवाल तथा यूपी के अखिलेश यादव ने इस हमले पर आक्रोश जताया है।

मगर पहेली यही रही कि उच्चतम सुरक्षा ममता को दी गयी है। यह जेडप्लस स्तर की है। इसमें सौ सिपाही सदैव उनके समीप ही रहते हैं। वे सब क्या कर रहे थे? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य शासन में स्वयं गृह विभाग संभालतीं हैं। पुलिस की वे सर्वेसर्वा हैं। निर्वाचन आयोग ने जांच के बाद अपनी रपट में बताया कि यह सारा हादसा एक महज दुर्घटना थी, कोई योजनाबद्ध प्रयास नहीं था। प्रश्न भी उठा कि ममता बनर्जी द्वारा नामांकन दाखिल करने के पश्चात ही यह हमला क्यों हुआ ? इरादतन होता तो पहले ही हो सकता था, ताकि वे चुनाव ही न लड़ पातीं।

इस पूरे प्रकरण में एक खास पहलू और उभरा है। हमला होने के कुछ समय पूर्व नन्दीग्राम में एक शिवालय में ममता बनर्जी जलार्पण करने गयीं थीं। वे ब्राह्मणपुत्री होने का दावा करतीं हैं। मांसाहारी हैं। चण्डीपाठ करतीं हैं। इसके जवाब में भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय का दावा है कि वे श्लोकों के उच्चारण में कई त्रुटियां करतीं हैं। हिन्दू कार्ड खेलने वालों पर ममता बनर्जी का तंज है कि वे उनसे बेहतर हिन्दू हैं। प्रत्युत्तर में भाजपाईयों की टिप्पणी थी कि जिस कदर ममता ने पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को पनपाया है और मुसलमान वोट बैंक रचा है, उन्हें चण्डीपाठ नहीं, बल्कि कलमा पढ़ना चाहियें।

ममता बनर्जी से उनके पुराने काबीना साथी और आज नंदीग्राम से उनके सीधे चुनावी प्रतिद्वंदी शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि : ''वीरभूम क्षेत्र में जन्मी ममता नंदीग्राम के लिये बाहरी हैं।'' हालांकि वीरभूम केवल तीन सौ किलोमीटर दूर है। इससे बढ़िया चपत लगी ममता को जो सदा ही वे पड़ोस के बिहारी तथा अन्य हिन्दीभाषियों को बाहरी कहती रहतीं हैं। उनकी नजर में ये भाजपा वाले, जो लोकसभा चुनाव में 40 फीसदी वोट पाकर और 42 में से 18 सीटें जीते, एक बाहरी हिन्दीभाषियों की जमात है।

ममता तुनुकमिजाजी हैं जो पश्चिम बंगाल की दस वर्ष से सीएम रहीं। जब वे अटल काबीना में रेलमंत्री बनी तो सांसद भवन में पूर्व रेल मंत्री नीतीश कुमार के कमरे को चाहतीं थीं। दूसरा कक्ष नामांजूर कर दिया। सिर्फ एक कमरे के खातिर ममता ने समूची राजग सरकार की खाट खड़ी कर दी। भला हो रक्षामंत्री जार्ज फर्नाण्डिस का जिन्होंने अपने पार्टीसाथी नीतीश कुमार को समझाबुझा कर उनका कमरा खाली करवाया। नरसिम्हा राव काबीना में ममता मंत्री थीं। अकस्मात एक दिन इस्तीफा देकर वे चल दीं, मानों रेल का डिब्बा बदल रहीं हों। उनकी हरकतों से लगता है कि राजनीति परिपक्वता अभी भी आनी बाकी है। इसी कारण से आज पश्चिम बंगाल में सारे राजनीतिक दल उनके विरुद्ध अलगअलग मोर्चा खोलें हैं। किसी का भी साथ नहीं मिला।

ममता पर हुये कथित हमले पर एक किस्सा याद आया। रोम के वेटिकन नगर में पोप जॉन पाल द्वितीय की हत्या का प्रयास (1981) मोहम्मद अली आगा नाम व्यक्ति ने किया था, पर विफल रहा। अमेरिकीयों ने तब आरोप लगाया था कि सोवियत रुस के पड़ोसी बलगेरिया (तब कम्युनिस्ट राष्ट्र) के नागरिक ने यह जघन्य प्रयास किया था। राजधानी सोर्फिया के प्रेस क्लब में मेरी जिज्ञासा को शांत करते वहां की श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के अध्यक्ष ने कहा : ''हत्यारा बलगेरियन कभी भी नहीं हो सकता है।'' मेरे कारण पूछने पर वे बोले : ''यदि बलगेरियन होता तो कभी भी निशाने से नहीं चूकता।'' यही तर्क उन संदिग्ध आक्रमणकारियों पर भी लागू होता है। यदि वे वस्तुत: हत्या का इरादा रखते तो बस ढाई फिट की दूसरी से हुये हमलें में असफल न होते।

तो यह घटना निखालिस नकली ही है, काल्पनिक भी। फिर आजकल ममता की राजनीतिक विश्वसनीयता शून्य स्तर पर है। तो भला कौन यकीन करे? चाहकर भी जनसंवेदना वे बटोर नहीं पायीं। घटना के दूसरे दिन ही एक काबीना मंत्री और पांच विधायक उनकी पार्टी को अलविदा कह गयें।

खबर थी कि ममता की एक पेन्टिंग दो करोड़ रुपये में बिकी थी। ये सियासतदां अब ​चित्रकार भी हो गयीं। इस पर उनके शत्रुओं ने आयकर विभाग का ध्यान आकर्षित कर दिया। इस राशि पर ममता ने टैक्स दिया? सबूत क्या हैं? उनके जख्म पर भी सवालों की ऐसी ही झड़ी लगी हुयी है। श्रद्धा चिट फण्ड घोटाला अब नासूर बना है। जवाब उन्हें देना होगा, वोटरों को। जय श्री राम से सख्त परहेज करनेवाली ममता को याद दिला दें कि उने चुनाव क्षेत्र नन्दीग्राम में भी ''राम'' हैं!!


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