MENU

सपा 298 और कांग्रेस को 105 सीटों पर हुआ गठबंधन


राजनैतिक विश्लेषक
 22/Jan/17

समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष नरेश उत्तम ने लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एलान किया कि कांग्रेश 2017 का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ेंगी |

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सात चरणों में होने हैं और पहले चरण का चुनाव 11 फरवरी को है | इससे पहले, दोनों पार्टियों के बीच सीटों को लेकर कई दौर की बातचीत हुई थी | समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल ने तो यहाँ तक कह दिया था कि कांग्रेस 120 सीटों पर अड़ी है और अब कांग्रेस से समझौता होना लगभग नामुमकिन है | पहले इस गठबंधन में अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल को भी शामिल किए जाने की चर्चाएं थी, लेकिन न तो सपा और न ही कांग्रेस अपने हिस्से की सीटें रालोद को देने पर राजी थी | समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव काफी पहले से ही अलग-अलग मंचों पर कांग्रेस को साथ लेकर चुनाव लड़ने की बात करते रहे हैं | प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने कहा कि सपा और कांग्रेस सभी सीटों पर मिलकर लड़ेंगे |

समाजवादी परिवार में मचे घमासान के बाद अखिलेश यादव पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरकर सामने आए थे | अपने पिता के ख़िलाफ़ चुनाव आयोग तक पहुँचे अखिलेश ने पार्टी के चुनाव चिन्ह के लिए जीत हासिल की थी और साबित किया था 'असली समाजवादी पार्टी' अब उनकी ही है | 

सपा-कांग्रेस का गठबंधन दोनों दलों को क्या होगा फायदा-नुकसान


समाजवादी पार्टी अखिलेश के नेतृत्व में कांग्रेस से 105 सीटों पर गठबंधन कर यूपी के चुनावी मैदान में उतरने जा रही है। ऐसे में राजनीतिक पंडितों की माने तो इसे सपा के लिए फायदे का सौदा मान रहे हैं तो वहीं कुछ इसे नुकसान मान रहे हैं।

 

यूपी में 19 फीसदी के आसपास मुस्लिम मतदाता है, जिनका 39 फीसदी वोट 2012 विधानसभा चुनावों में सपा को मिला था। विशेषज्ञो का मानना है कि यूपी में अयोध्या कांड के बाद से सपा ही एकमात्र मुस्लिम वोटर्स की पहली पसंद रही है, जबकि शेष 34 फीसदी वोट अन्य दलों में बंट जाता है। जिसमें से 2012 विधानसभा में कांग्रेस के पास 18 फीसदी वोट आया था। एक्सपर्ट्स की राय में मुस्लिम ढाई दशक से ज्यादा भाजपा को हराने के लिए एक तरफा वोट करता है, जिसका फायदा सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिल सकता है। वहीं, कांग्रेस को कम ही सही, लेकिन अगड़ों का भी वोट मिलता रहा है। इसका फायदा भी सपा को मिल सकता है। कांग्रेश के मैनेजमेंट गुरु प्रशांत किशोर, शीला दीक्षित को ब्राह्मण वोटों के ध्रुवीकरण लिए लाए मुख्यमंत्री के रूप में लाया था क्योंकी यूपी में 18% सवर्ण हैं। इनमें 11 फीसदी ब्राह्मण वोटर हैं, जो करीब 125 सीटों पर असर डालते हैं। पूर्वांचल में इनका काफी प्रभाव माना जाता है। ऐसे में माना जा रहा है कि ब्राह्मण वोटों का भी कुछ हिस्सा गठबंधन के खाते में आसकता है। यही वजह रही कि सपा में मचे घमासान के बाद कांग्रेस को साथ लेकर चलने का फार्मूला अखिलेश ने निकाला है। अखिलेश शुरू से ही यही कहते रहे कि अगर सपा-कांग्रेस साथ आते हैं तो 300 सीटें इस गठबंधन को मिल सकती है।

 

सपा को कितना होगा नुकसान

 

 विशेषज्ञो की मानें तो साल 1989 के बाद चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव हो कांग्रेस यूपीमें अपना जनाधार खोती चली गई। 1989 में हुए चुनाव में कांग्रेस के पास 94 सीट थी, जबकि 1991 में 46 सीट हुई। फिर 1993 में 28 सीट कांग्रेस को मिली। वहीं, 1996 में थोड़ा सुधार हुआ तो 33 सीट मिली। फिर 2002 में 25 सीटों पर ही कांग्रेस को संतोष करना पड़ा। फिर 2007 में कांग्रेस को 22 सीट मिली और 2012 में 28 सीट मिली। ऐसे में कांग्रेस के पास यूपी में ऐसा कोई खास इलाका नहीं है, जहां उसका जनाधार बचा हो। वहीं, कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले जिले अमेठी, रायबरेली और सुल्तानपुर में भी सपा ने खुद 2012 में सेंध लगाई थी। इन तीन जिलों में 15 सीटों पर 12 पर सपा ने जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को 2 सीट और पीस पार्टी को 1 सीट मिली थी। ऐसे में अगर कांग्रेस 105 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतारती है तो 298 सीटों पर टिकट की आस लगाए बैठे कांग्रेस के नेता निराश होंगे। ऐसे में वह उन सीटों पर सपा प्रत्याशी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। दरअसल, कहा जा रहा है कि दोनों दल एक दूसरे को वोट ट्रांसफर करवाएंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है |

 

कांग्रेस को कितना होगा फायदा

 

2012 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 28 सीटें जीती थी। एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि गठबंधन होने से कांग्रेस की 8 से 10 सीट बढ़ सकती है। दरअसल, यह उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि 2012 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 32 सीट पर दूसरे नंबर पर थी, जबकि इसमें से 3 सीट ऐसी थी जहां कांग्रेस महज 500 वोट के अंतर से हारी थी। वहीं, 18 सीट ऐसी थी, जहां कांग्रेस 5 हजार से 15 वोट से हारी थी। जानकार कहते हैं कि यह मार्जिन बताता है कि कांग्रेस के जो परम्‍परागत वोटर हैं वह सुप्तावस्था में है। अगर कांग्रेस अच्छे कैंडिडेट उतारे तो उसे फायदा मिल सकता है। इसका एग्जाम्पल भी 2012 में सामने आया, जब कांग्रेस के कैंडिडेट्स की लगभग 250 सीटों पर जमानत ही जब्त हो गई। विशेषज्ञो कहते हैं कि यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस 2017 में गठबंधन कर सपा से कम सीट मांग रही हो, लेकिन डील 2019 लोकसभा को लेकर भी हो सकती है कि वहां ज्यादा सीट लेंगे।

 

कांग्रेस को क्या होगा नुकसान

 

विशेषज्ञो मानते हैं कि यूपी में कांग्रेस का जो जनाधार है वह अब कांग्रेस के बड़े नेताओं का व्यक्तिगत जनाधार ही बचा हुआ है, जिसमे प्रमोद तिवारी, श्रीप्रकाश जायसवाल, जितिन प्रसाद, सलमान खुर्शीद जैसे लगभग यूपी के 2 दर्जन बड़े नेता शामिल हैं। कांग्रेस अगर शीला दीक्षित को सीएम के तौर पर अब प्रस्तुत नहीं करेगी | जिस 10 फीसदी ब्राह्मण वोट को लेकर कांग्रेस ने अपना कैम्पेन शुरू किया था उसका भी उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। कई नेता जो करीबी अंतर से 2012 में हारे थे अब वह टिकट का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अब गठबंधन की वजह से उन्हें टिकट नहीं मिलेगा। इसी वजह से वह अब वह पार्टी भी छोड़ेगे। इसीलिए कानपुर के बिठूर से अभिजित सिंह राणा, जोकि कांग्रेस के नेता थे उन्होंने टिकट के लिए ही कांग्रेस छोड़ भाजपा ज्वाइन कर लिया । विशेषज्ञो का मानना है कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है। ऐसे में चुनावों में उसकी सीटें पहले ही कम होती जा रही है। अब अगर चुनाव लड़ने के लिए भी अब 105 सीटों पर उतरेगी तो अगले चुनाव में वह टिक भी नहीं पाएगी।


इस खबर को शेयर करें

Leave a Comment