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काशी के रण में गंगापुत्र और शिवभक्तों में जंग !!

सुरेश प्रताप
वरिष्ठ पत्रकार
 25/Apr/18

कबीरदास ने इसी काशी में 600 वर्ष पहले लिखा था

"कौन ठगवा नगरिया लूटल हो....!!"

*और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 100 वर्ष पहले लिखा था

"अंधेर नगरी चौपट राजा !!"

हे गंगापुत्र ! क्यों बनाना चाहते हैं काशी को जापान का क्योटो शहर ? क्या इस शहर की गलियां, गंगाघाट, पेड़-पौधे, चिड़ियां, पुरानी मकानें और यहां की आबोहवा पसंद नहीं है ? क्यों कटवा दिए नीम, जामुन, पीपल, बरगद, महुआ, आम, शीशम के दरख्त ? और उनकी जगह खजूर और ताड़ प्रजाति के पेड़ लगवा दिए ! जिससे न राहगीरों को छाया मिलेगी और न ही चिड़ियों को घोसला बनाने की जगह ! क्या चिड़ियों के चहचहाने से नफरत है ?

आखिर क्या है सौन्दर्यबोध ? बताते क्यों नहीं ? चुप क्यों हैं ? क्या बताने में डर लग रहा है. आखिर किससे लग रही है डर ? जब पहली बार 2014 में यहां आए, तो कहे थे कि "न मुझे यहां किसी ने भेजा है और न मैं अपनी मर्जी से आया हूं. मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है". मुझे आज भी वो सभी बातें याद हैं. तब हम बहुत खुश हुए थे. सोचे चलो बहुत दिनों बाद दूर देश से आया है मां गंगा का पुत्र ! याद है न तब यहां के शिवभक्त "हर-हर और घर-घर" के उद्घोष से जयकारा लगाए थे. यही नहीं नगाड़े की थाप पर झूम-झूमकर सड़क पर नाचे थे. तब बहुतेरे कहते थे कि "ई सब पगला गए हैं." लेकिन उनकी बातों की यहां के लोगों ने परवाह नहीं की.

और मंच से खुश होकर तब आप बोले थे "अच्छे दिन आएंगे और सबका साथ सबका विकास" ! हमने विश्वास कर लिया और उछल-उछल कर सड़क पर नाचने लगे. "हर-हर" का मतलब समझते हैं ? यह काशीवासियों की सबसे बड़ी उपाधि है. इसका उद्घोष महादेव के लिए किया जाता है या फिर काशी नरेश का स्वागत करने के लिए. हमने उस उपाधि से भी विभूषित कर दिया. विदेश से कालाधन आने पर सबको 15-15 लाख रूपये देने का वादा किए थे. क्या भूल गए वो सब बातें और वायदे. अब आपके चाणक्य कहते हैं कि वह सब "जुमला' था. क्या यह सही है. क्या हमको ठगा गया ?

और अब जानते हैं यहां क्या हो रहा है. पक्कामहाल का नाम तो सुने ही होंगे, जहां बाबा विश्वनाथ मंदिर है. आप तो दर्शन-पूजनकरने यहां आए ही थे. और यदि याद नहीं आ रहा है, तो बता देते हैं 2017 में जब उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव हो रहा था, तब आप चुनाव प्रचार करने आए थे. और शहर दक्षिणी से सात बार लगातार भाजपा से विधायक रहे "दादा श्याम" को टिकट नहीं मिला था. वह गुसिया गए थे. और गुस्से में चुनौती दे रहे थे. उन्हें मनाने की कोशिशें हो रही थीं. आपकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी. लेकिन जब आप बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आए तो बेचारे "दादा श्याम" आपका स्वागत करने के लिए हाथ जोड़े विश्वनाथ गली के मुहाने पर खड़े थे. उन्हें देखते ही उनका हाथ पकड़कर आप उन्हें अपने साथ लेते गए. बाद में दादा भी खुश हो गए. उनके कान में आपने कुछ कहा था. क्या कहा था, हमें नहीं मालूम ! आप भी शायद भूल गए होंगे. लेकिन "दादा श्याम" उसे भूले नहीं. एक वर्ष तक उसी "कनफूंकुआ मंत्र" की माला जपते रहे. अब उनका भी मोहभंग हो गया है.

तो असल मुद्दे पर आने से पहले इसकी चर्चा जरूरी थी. तभी बात समझ में आएगी. अस्सी नदी की सफाई की अब चर्चा नहीं होती. वो तो अब नाला में तब्दील हो गई है. वरूणा नदी की दशा भी दयनीय है. उसमें पानी ही नहीं है. और रही बात मां गंगा की, तो बेटे को तो पता ही होगा. नहीं पता है तो फ्रांस के राष्ट्रपति के 12 मार्च, 2018 को आगमन पर घाट किनारे पैबन्द लगाने की क्या जरूरत पड़ गई थी. उमा भारती की कसम की भी याद दिलानी पड़ेगी क्या ? शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती-किसानी, रोजगार, उद्योग, शहर की यातायात व्यवस्था आदि बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जहां काम करने की अपार संभावनाएं हैं.

लेकिन यह सब नहीं होगा ? चाहिए सिर्फ पक्कामहाल क्षेत्र के लोगों की दुकानें, मंदिर और घर ! विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर और गंगा पाथवे बनाने के लिए. 2014 में क्यों नहीं बताए थे की हर-हर कर रहे हो तो हमें चाहिए पक्कामहाल के लोगों का "घर" भी. साहब आपके लोग अभी तक योजना के बारे में क्षेत्रीय लोगों को कुछ नहीं बता रहे हैं. जनप्रतिनिधि चुप्पी साधे हैं. और पक्कामहाल के लोग और दुकानदार चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे हैं अपनी अस्मिता से जुड़े सवाल ?

जब गंगा में पानी ही नहीं रहेगा, तो कहां चलेगी नाव और जहाज ! कैसे होगा जलविहार ? विकास के लिए पेड़-पौधे काट देंगे तो कहां से सांस लेने के लिए लोग लाएंगे आक्सीजन ! क्या बिना आक्सीजन के जीवन की कल्पना की जा सकती है ? याद है न दिल्ली में आसमान में धुंध छाने से हवा जहरीली हो गई थी. और तब ऐहतियातन स्कूल कालेज बंद करने पड़े थे. पानी तो प्लास्टिक की बोतल में बिक ही रही है. सांस लेने के लिए क्या आक्सीजन भी बिकेगी ? गोरखपुर के अस्पताल में तो आक्सीजन की कमी से सैकड़ों बच्चों की मौत भी हो गई थी. क्या हुआ उस मामले में ? और जब गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ तो जोगी बाबा की तमाम कोशिशों के बावजूद पटखनी खा गए. और योगी बाबा के गढ़ में लग गई सेंध !!

 

जब पानी और हवा जहरीली हो जाएगी तो जीवन कैसा होगा ? क्या मंदिर और घर ध्वस्त करने से पर्यावरण ठीक हो जाएगा ? यह कैसा विकास है, जो आदमी को उसकी जड़, संस्कृति और अस्मिता से ही काट दे. और यदि विकास ठीक है, उसकी दशा और दिशा सही है तो जनप्रतिनिधि चुप्पी क्यों साधे हैं ? धरोहर बचाओ समिति और विश्वनाथ गली व्यापार मंडल के लोग यही तो सवाल पूछ रहे हैं.

घर, दुकान, मंदिर तोड़े जाने से व्यथीत कई लोग बीमार हो गए. 3-4 लोग तो अस्पताल पहुंच गए. ब्लडप्रेशर और सुगर के कई मरीज बिस्तर पकड़ लिए. डर गए हैं पक्कामहाल के वशिंदे. कई ऐसे चेहरे जो "विकास" का झंडा ढोते हैं और सुबह डंडा परेड मे शामिल होते हैं वो भी "धरोहर बचाओ" आन्दोलन में शामिल होकर "विकास" को गरियाने लगे हैं. उनकी यह पैंतरेबाजी कुछ समझ में नहीं आ रही है. आदमी के चेहरे पर कई मुखौटे लगे हैं ? मुन्ना इससे काफी छुब्ध हैं.

कबीरदास को याद करते हुए अभी कल ही शाम को गंगा किनारे घाट की सीढ़ियों पर बैठे कुछ लोग बतिया रहे थे कि 600 वर्ष पूर्व इसी काशी में कबीर लिखे थे "कौन ठगवा नगरिया लूटल हो"! और डफली बजाकर वो गा रहे थे.."बाबा निरमोहिया रे तोहरी नगरिया हमसे छूटल जाय,

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो !!"

दरअसल कबीर का नाम लेकर यहां लोग बहुत कुछ कहते रहते हैं. कबीर और तुलसी बाबा दोनों का बनारसियों के मिजाज पर काफी असर है. "चना-चबेना और गंगजल" के दर्शन पर विश्वास करने वाले बनारसी अब "विकास" की नौटंकी देखकर भकुआ गए हैं. लेकिन उनका भकुआना भी आने वाले तूफान का संकेत है. 100 वर्ष पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा था "अंधेर नगरी चौपट राजा...!" कबीर और भारतेन्दु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं. इन दोनों महान साहित्कारों को पढ़ने की जरूरत है.

बाबा विश्वनाथ के प्रिय सांड़ की एक प्रतिमा पिछले दिनों लखनऊ-वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर संत अतुलानंद चौराहे पर लगी थी. पहले प्रतिमा सफेद थी, जिसे रंगरोदन करके मटमैला रंग का कर दिया गया. फिर उसकी पीठ पर स्वच्छता अभियान का स्लोगन और नीति उपदेशक वाक्य लिखे गए. उसके बाद फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और पीएम मोदी के 12 मार्च को आगमन से पहले कार्यक्रम की तैयारी का जायजा लेने सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ आए थे. और योगी बाबा के जाने के कुछ ही घंटे बाद प्रशासन ने जेसीबी मशीन लगाकर उसे जमींदोज कर दिया. इस घटना के बाद ही पक्कामहाल में भी गणेश मंदिर और व्यास जी का घर जमींदोज कर दिया गया. तो क्या इन दोनों घटनाओं में कोई अन्तर-सम्बन्ध है ? वैसे शहर में विचरण करने वाले सांड़ों के भोजन-पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. स्वच्छता अभियान के तहत बने कूड़ाघर ही उनका विश्राम स्थल हैं. और वहीं वो दाना-पानी की दिन-रात तलाश करते हुए देखे जा सकते हैं. और जलपरी गंगा में तुलसीघाट के सामने महीनों से खड़ी न जाने किसकी प्रतीक्षा कर रही हैं. और अंत में ज्योति खरे के शब्दों में...

"न वो इधर गए हैं, वो न उधर गए हैं

मत पूछिए की लोग, शहर के किधर गए हैं..."!


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