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पीएम के विश्वनाथ धाम का समाचार कवर करने के लिए मीडियाकर्मियों को अनुमति नहीं

सुरेश प्रताप
वरिष्ठ पत्रकार
 12/Mar/19

यानी पक्कामहाल में 8 मार्च को महिला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्वनाथ मंदिर कारीडोर की आधार शिला रखते हुए इसे मुक्ति पर्व बताया. लेकिन आश्चर्य की बात है कि मुक्ति पर्व पर आयोजित कार्यक्रम का समाचार कवर करने के लिए मीडियाकर्मियों को अनुमति नहीं दी गई थी.

मीडियाकर्मी विश्वनाथ धाम के बाहर टहल रहे थे. इसके बावजूद स्थानीय अखबारों में प्रधानमंत्री की खबर प्रमुखता से पहले पेज पर प्रकाशित हुई है. प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में इतना बड़ा ऐतिहासिक कार्यक्रम आयोजित हुआ और रिपोर्टरों को वहां फटकने तक नहीं दिया गया. आखिर क्यों ? क्षेत्रीय नागरिकों को भी समारोह स्थल पर जाने की अनुमति नहीं दी गई. समारोह स्थल से लगभग तीन सौ मीटर की दूरी पर स्थित मलिन बस्ती के लोगों को तो उनके घर में ही एक तरीके से नज़रबंद कर दिया गया था. कुछ सौभाग्यशाली लोग थे, जो “धरोहर बचाओ” आंदोलन के रणनीतिकार भी थे और उन्हें पीएम के कार्यक्रम में जाने का सौभाग्य भी मिला. जबकि कुछ लोगों का नाम अंतिम दौर में निमंत्रण सूची से हटा दिया गया.

उल्लेखनीय है कि मंदिर कारिडोर और गंगा पाथवे के लिए विगत एक सप्ताह से मलिन बस्ती में घरों को ध्वस्त किया जा रहा है. लेकिन मीडिया की नज़र इस खबर पर नहीं है. "मुक्ति पर्व" के ऐतिहासिक महत्व का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि "70 वर्ष में इधर किसी ने ध्यान नहीं दिया और मैने बाबा विश्वनाथ को संकरी गलियों और कब्जे से मुक्त करा दिया. अब बाबा खुली हवा में सांस ले सकते हैं. साथ ही यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ संकेत करते हुए कहा कि यदि उनका सहयोग मिला होता तो कारिडोर का काम अब तक पूरा हो गया होता.

सवाल यह है कि जब मुक्ति पर्व पर इतना महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित हो रहा था, तो मीडियाकर्मियों को समाचार की रिपोर्टिंग करने की अनुमति क्यों नहीं दी गई ? और यदि ऐसा हुआ तो दूसरे दिन अखबारों ने इस खबर का उल्लेख क्यों नहीं किया ? क्या अब मीडिया सुनने, देखने और कार्यक्रम की रिपोर्टिंग करने से भी वंचित कर दी गई है ? यह कैसा लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है ? जिसके पास पीएम के कार्यक्रम की रिपोर्टिंग करने का अधिकार भी नहीं है ? इसके बावजूद मीडियाकर्मी चुप्पी साधे हैं.

मुक्ति पर्व के 24 घंटे बाद विश्वनाथ धाम के लोगों ने बताया कि दिल्ली से प्रधानमंत्री का कार्यक्रम कवर करने यहां आए इलेक्ट्रानिक चैनलों के कुछ रिपोर्टर 8 मार्च को भोर में ही वही पहुंच गए थे, लेकिन उन्हें सुरक्षाकर्मियों ने कार्यक्रम स्थल पर जाने की अनुमति नहीं दी. सिर्फ डीडी न्यूज यानी दूरदर्शन को ही समाचार संकलित करने की अनुमति मिली थी. पीएम मोदी द्वारा बाबा विश्वनाथ को मुक्त करने और इसे मुक्ति पर्व बताने पर पक्काप्पा के लोग अपने-अपने तरीके से तर्क वितर्क कर रहे थे. उनका कहना था कि आखिर कोई व्यक्ति बाबा विश्वनाथ को मुक्त कैसे करा सकता है ?

पक्काप्पा के निर्मल मठ जो अभी बिका नहीं है कि दीवार पर लगे पीएम मोदी के प्लास्टिक को पोस्टर कई जगह से फट गए हैं. जो देखने में काफी भद्दा लग रहे थे. लेकिन इसकी सुधि लेने वाला वहां कोई नहीं है. वृद्ध आश्रम के जिस भवन को ध्वस्त किया गया है उसके परिसर में स्थित कुएं को भी अब मलवे से पाट कर समतल कर दिया गया है.

पीएम मोदी के लिए बने मंच से लगभग एक सौ मीटर की दूरी पर स्थित जिस मंदिर के बारे में "हमें आपके आशीर्वाद की आकांक्षा है" की तरफ से दावा किया गया है कि इसे चंद्रगुप्त ने बनवाया था कि ऐतिहासिकता के बारे में भी कोई आवाज नहीं उठा रहा है. मीडिया तो अब सवाल पूछने की आदत ही भूल गई है.

जबकि पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव के हवाले से विगत दिनों अखबारों में खबर छपी थी कि पक्कामहाल में सबसे पुराना विश्वनाथ मंदिर है. और घरों को ध्वस्त करने के बाद जो मंदिर मिले हैं वो 18वीं सदी के हैं. इसके बावजूद गलत तथ्यों को प्रमुखता से वहां दर्शाया गया है. इस सम्बन्ध में स्थानीय अखबारों में खबर भी छपी थी. इसके बावजूद ऐतिहासिक तथ्यों के साथ विश्वनाथ धाम में खुलकर खिलवाड़ किया जा रहा है.

आखिर यह कैसा मुक्ति पर्व है ? क्या हम इतिहास से भी मुक्ति चाहते हैं ? अब तो पक्काप्पा के लोगों को ही मंदिर चोर कहा जा रहा है. पक्कामहाल में "मंदिर में घर और घर में मंदिर" क्यों बनाए गए थे ? इसकी ऐतिहासिकता को खंगालने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है. इस परिप्रेक्ष्य में विश्वनाथ धाम के विद्वानों की चुप्पी भी खलती है. सच को सच और गलत को गलत कहने की शक्ति लगता है अब काशीवासी भूल गए हैं. मीडिया को इस संदर्भ में सक्रियता के साथ पहल करनी चाहिए नहीं तो भविष्य में उन्हीं से सवाल पूछा जाएगा कि उनकी चुप्पी का रहस्य क्या था ?

यह प्रत्रकार का अपना विचार है


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