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अपने ही चक्रव्यूह में फंस गए महाबली



 30/Mar/19

बहुत परिश्रम से करोड़ों रुपये खर्च करके तथा 300 घरों व अनेक मंदिरों को जमींदोज करके पक्काप्पा यानी पक्क्कामहाल का रणक्षेत्र सज-धज कर 2019 के महारथियों के स्वागत के लिए तैयार है । सबके अपने-अपने समीकरण हैं और िवकास के दावे हैं। लेकिन एक बात जो सच है, वह यह कि 2014  की गणित 2019  में बदल कर अब बीज-गणित बन चुकी है, और यही कारण है कि धुक-धुकी सबको सता रही है ।

विद्रोह के स्वर भी अब मुखर होकर सतह पर आ चुके हैं । जिसकी धमक मीडिया तक पहुँच चुकी है । इस सच्चाई को अब नकारा नहीं जा सकता है । जो परिस्थितियाँ 2014  के लोकसभा चुनाव से पूर्व थी वह अब नहीं हैं ।  कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने लखनऊ में रोड-शो की सफलता के बाद 18 से 20 मार्च तक प्रयागराज से बनारस तक गंगायात्रा करके पू्र्वांचल की राजनीति में मजबूती से हस्तक्षेप किया है जबकि 2014  में ऐसा नहीं था।

पक्काप्पा के मुक्तिधाम का 8 मार्च 2019 को शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बनारस में यह घोषणा की थी कि अब बाबा विश्वनाथ मुक्त हो गए हैं और खुली हवा में सांस लेंगे यानी पहले वो बंधन में थे । यही नहीं 40 मंदिरों को भी उन्होंने घरों को ध्वस्त कर मुक्त कराने का दावा किया था। दूसरे शब्दों में कहें तो पक्कामहाल के लोग मंदिर चोर थे ।

सवाल यह है कि यदि वो मंदिर चोर थे। तो एफआईआर दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया । शासन-प्रशासन ने अवैध कब्जा करने वालों को करोड़ों रुपये देकर उनका घर क्यों खरीदा और यदि खरीद भी लिए तो अब उन्हें मंदिर चोर कहना कहां की नैतिकता है। बनारस में घर में मंदिर और मंदिर में घर की अपनी एक संस्कृति और जीवनशैली है । इसके कुछ ऐतिहासिक व सामाजिक कारण हैं । उसे समझने की जरूरत है । यहाँ गलियों घरों व उनकी दीवारों में अनेक मंदिर सैकड़ों वर्ष से बने हैं ।

यह मुद्दा अब बहस के केंद्र में आ गया है । जबकि 2014  के लोकसभा चुनाव से पूर्व ऐसी बहस बनारस में नहीं थी । उधर भाजपा की सहयोगी अपना दल भी अब विभाजित होकर दो टुकड़े में बंट गई है । एक गुट भाजपा के और दूसरा कांग्रेस के साथ है । अपना दल कृष्णा गुट की नेता पल्लवी पटेल को प्रियंका गांधी ने अपनी गंगा यात्रा के दौरान हमेशा अपने साथ रखा था और उन्हें विशेष महत्व दिया था ।

भाजपा की यूपी में एक अन्य सहयोगी पार्टी सुहेलदेव भासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर जो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं । के खट्टे- मिठे रिश्ते जगजाहिर हैं । वो रोज धमकी देते रहते हैं । अभी उनकी सौदेबाजी की रणनीति चल ही रही है । उधर सपा व बसपा भी 2014 में अलग-अलग चुनाव लड़े थे जबकि अब सपा-बसपा का गठबंधन हो चुका है और उनके बीच हुए सीट बंटवारे में बनारस सीट सपा को मिली है । अभी उनके प्रत्याशी की घोषणा नहीं हुई है । सपा-बसपा गठबंधन भी भाजपा यानी एनडीए के समक्ष चुनौती बनकर खड़ी है ।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि बनारस संसदीय क्षेत्र में 2014 का समीकरण 2019 में बिल्कुल बदल चुका है । भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यहाँ से प्रत्याशी घोषित कर दिया है लेकिन विपक्ष ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले है । प्रियंका गांधी की गंगा यात्रा की सफलता के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 27 मार्च को कटिंग मेमोरियल स्कूल परिसर में िवजय संकल्प सभा की थी जिसमें भीड़ नहीं जुटी थी जो चर्चा का विषय बना है ।

बनारस से सटी भदोही संसदीय सीट है जहाँ के सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त को भाजपा ने बलिया से प्रत्याशी बनाया है और बलिया के सांसद भरत सिंह का टिकट कट गया है । भरत सिंह के समर्थकों ने 27 मार्च को बलिया के भाजपा कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया और मस्त गो-बैक के नारे लगाए । भाजपा सांसद भरत सिंह ने भी जनता के नाम खुली चिट्ठी लिखकर भाजपा प्रत्याशी वीरेन्द्र सिंह मस्त पर कई गम्भीर आरोप लगाया है । यह भी भीतर से खड़ी एक चुनौती है ।

पटना हवाई अड्डे पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और सांसद आरके सिंहा के समर्थकों के बीच हुई झड़प और बेगूसराय से प्रत्याशी बनाए जाने पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा उठाए जा रहे सवाल सोशल मीडिया में सुर्खियों में है। जबकि 2014 में भाजपा इस तरीके के आंतरिक झंझावातों व अन्तरविरोधों से नहीं जूझ रही थी । उधर पटना से भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा अलग ही ललकार रहे हैं । एक चीज और 2019 में अब भाजपा नेताओं को सवाल पूछने का नहीं बल्कि जवाब देने का समय आ गया है

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी अपनी रैलियों में जो सवाल उठाते थे वही सवाल अब उनसे जवाब मांग रहे हैं । हमेशा जातीय समीकरणों के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता है । क्षेत्रीय क्षत्रपों की विश्वसनीयता भी 2019 के लोकसभा चुनाव में दांव पर लगी है और जनता भी अब मुखर होकर सवाल पूछने लगी है । इस परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के चक्रव्यूह को फतह करना उतना आसान नहीं हैए जितना 2014 में था । हर-हर और घर-घर के उद्घोष की भी अब हवा निकल चुकी है ।


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