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के विक्रम राव ने स्पर्श किया था बापू का चरण

के. विक्रम राव
अध्यक्ष, IFWJ
 03/Oct/19

उन भाग्यशालियों में हूँ मैं जिन्होंने महात्मा गाँधी के चरण स्पर्श किये| बात 1946 के शुरुआत की है| कक्षा प्रथम में पढ़ता था| जेल से रिहा होकर पिताजी (स्व. श्री के. रामा राव, संस्थापकसंपादक नेशनल हेराल्ड) परिवार को वर्धा ले गये| जालिम गवर्नर मारिस हैलेट ने हेराल्ड पर जुर्माना ठोक कर उसे बंद ही करवा दिया था| चेयरमैन जवाहरलाल नेहरू भी पुनर्प्रकाशन में नाकाम रहे| सेवाग्राम में हमारा कुटुम्ब बजाज वाड़ी में रहा| गाँधीवादी जमनालाल बजाज का क्षेत्र था| एक दिन प्रातः टहलते हुए बापू के पास पिताजी हम सबको ले गये| हमने पैर छुए| बापू ने अपनी दन्तहीन मुस्कान से आशीर्वाद दिया| मौन का दिन था, अतः बोले नहीं| फिर युवा होने पर जेपी तथा लोहिया से बापू को मैंने और जाना| मगर आज भी एक वेदना सालती रहती है कि इस अस्सी वर्षीय निहत्थे संत की हत्या करने वाला नाथू राम गोडसे जरूर कसाई रहा होगा| निर्मम, निर्दयी, जघन्य हत्यारा| उसके पाप से वज्र भी पिघला होगा| गोडसे के साथ फांसी पर चढ़ा नारायण आप्टे तो एक कदम आगे था| उसने 29 जनवरी 1948 की रात दिल्ली के वेश्यालय में वितायी थी| ऐसा आदर्श था ! नाथूराम ने अपना जीवन बीमा बड़ी राशि के लिए कराया था| लाभार्थी थी उसके अनुज गोपाल की पत्नी| गोडसे ने लन्दन-स्थित प्रिवी काउंसिल में सजा माफ़ी की अपील भी की थी, ख़ारिज हो गई थी|

जंगे आजादी के दौर में पत्रकारिता-विषयक बापू के आदर्श और मानदण्ड अत्यधिक कठोर थे| हिदायत थी कि झूठा मत छापो, वर्ना पत्रिका बंद कर दो| उसी दौर में हमारी बम्बई यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स ने बापू को अपना अध्यक्ष बनाने की पेशकश की थी| बापू की शर्त थी कि सत्य ही प्रकाशित करोगे| वे पत्रकार फिर लौटकर नहीं आये| उस वक्त भारत में चार ही संगठन थे : दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स, मद्रास यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स, बम्बई यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स तथा कलकत्ता में इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन| इन सब ने मिलकर जंतर-मंतर पर 28 अक्टूबर 1950 को इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वोर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) की स्थापना की थी|

प्रतिरोध के गाँधीवादी तरीके पर इमरजेंसी (1975-77) के दौरान तिहाड़ जेल में हम साथी लोग काफी बहस चलाते थे| प्राणहानि न हो तो विरोध जायज है| आखिर 1942 में जेपी और लोहिया भी तो तार काटने, पटरी उखाड़ने, ब्रिटिश संचार व्यवस्था को ध्वस्त करने, भूमिगत पत्रिका छापने तथा समान्तर रेडियो से संघर्ष चलाते थे|

एक अति विशिष्ट अनुभव को साझा कर दूं| लखनऊ विश्वविद्यालय के अपने चन्द मित्रों के साथ हमने नाथूराम की प्रेतात्मा से संवाद किया था| छः दशक पूर्व का किस्सा है| साईकालोजी के हमारे एक साथी ने एक लेख का उल्लेख किया जिसे ब्रिटेन के महान भौतिक शास्त्री लार्ड जॉन विलियम्स स्ट्रट रेले ने लिखा था| जॉन विलियम्स को 1904 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था| वे बड़े धर्मनिष्ठ थे और पराविज्ञान में निष्णात थे| प्लैंशेट पर वे बहुधा अपने दिवंगत पुत्र से वार्ता करते थे| एक बार पुत्र ने बताया कि वह एक अत्यंत ज्वलनशील स्थान पर है| मगर भारतीय आत्माएं यहाँ से शीघ्र मुक्ति पा लेती थीं क्योंकि उनके भूलोकवासी रिश्तेदार आटे से गेंदनुमा ग्रास बनाकर कोई रस्म करते थे| पिंडदान ही रहा होगा| उत्कंठावश हमने भी प्लैंशेट का प्रयोग किया| गाँधी जी को आमंत्रित किया| मगर आया नाथूराम| उसने कहा, “गाँधी जी बहुत ऊंचे लोक में चले गये| अतः वे नहीं आ सकते| मगर मैं आ गया हूँ|” हमने पूछा कि, “कहाँ पर हो|” नाथूराम का जवाब था, “पूना की एक गली में आवारा कुत्ता हूँ| खुजली से ग्रस्त हूँ|”

इसीलिय नरेंद्र मोदी की तारीफ करनी होगी कि बापू की डेढ़ सौंवी जन्मगांठ बड़े शुभ उद्देश्य से मनवा रहे हैं| जबकि गुजरात में इस पूर्व मुख्यमंत्री को राष्ट्रधर्म सिखाने वाले अटल विहारी वाजपयी ने बापू को राष्ट्रपिता कहने से साफ इनकार कर दिया था| अटलजी का तर्क था कि राष्ट्र का पुत्र, पिता नहीं हो सकता है|

 


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