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हिन्दुओं के शीर्ष धर्माचार्यों पर केन्द्र सरकार को विश्वास क्यों नहीं : अविमुक्तेश्वरानन्‍द



 06/Feb/20

विगत 9 नवम्बर 2019 को जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने सदियों पुराने श्रीरामजन्मभूमि विषयक विवाद में फैसला दिया तो हर सनातनी हिन्दू ने अपने हर विचार को एक तरफ रख उसका स्वागत किया था।

यह पहला मौका था जब हिन्दुओं के समस्त शीर्ष मान्य धर्माचार्य रामालय न्यास की शक्ल में एकजुट होकर अयोध्या की श्रीरामजन्मभूमि में भव्य दिव्य शास्त्रोक्त मन्दिर के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हुये और केन्द्र सरकार को लिखित रूप से अवगत कराया कि हम इस कार्य को विधिवत सम्पादित करने को तैयार हैं ।

तीन महीने की लम्बी प्रतीक्षा में हर सनातनी हिन्दू यह कल्पना करता रहा कि श्रीरामजन्मभूमि में रामजी के मन्दिर के निर्माण के बहाने ही सही हमारे शीर्ष धर्माचार्यों को एक साथ मिलजुलकर काम करने का अवसर मिलेगा।

पर पांच फरवरी को आई अधिसूचना में सरकार ने एक अलग ही न्यास और उसमें अपने 'कार्यकर्ता' सदस्यों की घोषणा कर यह जता दिया कि केन्द्र की भाजपा सरकार को हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्यों पर तनिक भी भरोसा नहीं है ।

उक्त उद्गार रामालय न्यास के सचिव और अखिल भारतीय श्रीरामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के उपाध्यक्ष तथा पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि स्वामिश्रीःअविमुक्तेश्वरानन्‍द सरस्वती ने आज काशी के केदारघाट स्थित श्रीविद्यामठ में व्यक्त किये। वे पांच फरवरी को केन्द्र सरकार द्वारा घोषित श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सन्दर्भ में पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे ।

क्या शीर्ष धर्माचार्यों की उपेक्षा करने वाले से हिन्दू धर्म की रक्षा सम्भव है ?

धर्म वह गूढ़ विषय है जिसका हमारे जीवन के प्रत्येक क्षण पर प्रभाव पड़ता है। इसे लोकोन्मुख बनाने और जटिल गुत्थियों को सुलझाकर आम आदमी के जीवन में भव्यता दिव्यता भरने के लिये गुरुओं की कल्पना की गई है। गुरुओं को भी मार्गदर्शन मिले इसके लिये परमज्ञानी गुरुओं को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। धर्म के सम्बन्ध में वे ही कोटि-कोटि सनातनी हिन्दुओं के लिये उन पूज्य आचार्यों के वचन ही प्रमाण हैं। उन आचार्यों की ही यदि उपेक्षा कर दी जायेगी तो फिर सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा कैसे हो पायेगी ?

कहीं यह सनातन हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्यों के विरुद्ध कोई षड्यंत्र तो नहीं ?

सनातन हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्यों को दरकिनार कर कुछ तथाकथित 'कार्यकर्ता' सन्तों को न्यास में रखकर आखिर केन्द्र सरकार क्या संदेश देना चाहती है ? कहीं यह धर्माचार्यों को परे धकेलकर हिन्दू जनता को पूरी तरह अपने वर्चस्व में लेने की नेताओं और उनके पीछे खड़ी तथाकथित संस्थाओं की योजना तो नहीं ? इस पर विचार का यह समय है।

स्वामी वासुदेवानन्द जी शंकराचार्य तो क्या सन्यासी भी नहीं

जिन स्वामी वासुदेवानन्द जी को केन्द्र सरकार ने न्यास में न्यास संस्थापक के बाद पहला स्थान दिया है वे ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य तो क्या सन्यासी भी नहीं हैं। यह बात हम नहीं, बल्कि सिविल जज सीनियर डिवीज़न इलाहाबाद जिला न्यायालय ने अपने निर्णय दिनांक 5 / 5 / 2015 में अयोग्य सन्यासी कहते हुये उन्हें ज्योतिष्पीठाधीश्वर कहने से निषिद्ध कर दिया और उक्त निर्णय के विरुद्ध स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती द्वारा की गई अपील में ईलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विचार पूर्वक अपने निर्णय दिनांक 22 सितम्बर 2017 द्वारा निचली अदालत के निर्णय को सही मानते हुए उनके विरुद्ध निषेधाज्ञा बरकरार रखा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उक्त निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में कई गई अपीलों में पारित अपने आदेश दिनांकित 04/10/2018 के द्वारा अपीलों के लंबित रहने तक जगतगुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर के रूप में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को मान्यता प्रदान करते हुए स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती पर ज्योतिष्पीठाधीश्वर कहने से लगी रोक को जारी रक्खा।इतना ही नहीं स्वामी वासुदेवानन्द जी प्रयाग के एक लूट मार के आपराधिक मामले में जमानत पर हैं ।

फर्जी शंकराचार्य को ट्रस्ट में रखना न्यायालय की अवमानना ही नहीं समस्त हिन्दू जाति का अपमान

जो व्यक्ति सन्यासी ही नहीं सिद्ध हो सका उसे केन्द्र सरकार ने ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुत कर न केवल देश की उच्चतमन्यायालय की अवमानना की है अपितु कोटि कोटि सनातनी हिन्दुओं का अपमान भी किया है।इसके लिये हम अवमानना का केस भी डालेंगे और जनता में भी जायेंगे ।

प्रश्न यह है कि क्या संघ ही दुनिया चलायेगा ?

ट्रस्ट में संघ कार्यकर्ताओं की ही नियुक्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि संघ हमारे धर्मस्थानों पर कब्जे की तैयारी कर रहा है । यह वही मानसिकता है कि सब कुछ हम ही करेंगे । इसके लिये किसी को भी परे धकेलने के लिए भी वे तत्पर दिखाई दे रहे हैं । इसीलिए अपने प्रचारकों को उन्होंने ट्रस्ट में सम्मिलित कराया है ।

जिन्हें उच्चतमन्यायालय ने दोषी पाया उन्हें ही ट्रस्ट में स्थान देना अत्यन्त अनुचित

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय दिनांक 9 नवम्बर 2019 में अनेक बार उन लोगों की भर्त्सना की है जिन लोगों ने 1992 में अयोध्या की श्रीरामजन्मभूमि में स्थित ढांचे को कानून की अवहेलना करते हुये गिरा दिया था । न्यास में उन्हीं को जगह दी गई है । स्वामी वासुदेवानन्द तो कारसेवा के अध्यक्ष ही थे । उडुपी उमा भारती का गुरुस्थान है और परमानन्द जी साध्वी ॠतम्भरा के गुरु । गोविन्द देव गिरि और होमियोपैथी के डाक्टर अनिल मिश्रा पुराने संघी जो कि अभी भी पदाधिकारी हैं ।

आखिर ट्रस्टी होने का क्राइटेरिया क्या है ?

किसी भी पद या दायित्व के निर्वहन के लिये कोई क्राइटेरिया यानी मानदंड होता है। तो फिर अयोध्या की श्रीरामजन्मभूमि में मन्दिर निर्माण के लिये अस्तित्व में आ रहे ट्रस्ट का ट्रस्टी होने के लिये भी तो कोई मानदंड होगा? ट्रस्ट की सूची देखकर तो यही लगता है कि संघी होना ही एकमात्र मानदंड है । जिसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता ।

मन्दिर में आरक्षण कहाँ तक उचित ?

आज जब पूरे देश में आरक्षण को रखने और हटाने पर चर्चा हो रही है तो फिर भविष्य के मन्दिर में आरक्षण क्यों? कम से कम रामजी के दरबार में तो सब बराबर होने चाहिए ?

दलित ट्रस्ट में तो ओबीसी क्यों नहीं ?

हम तो यह मानते हैं कि रामजी के दरबार में दर्शन के लिये हम सब हिन्दू एक रहें । पर यदि आरक्षण देना ही है तो केवल दलित को क्यों ओबीसी को भी क्यों नहीं ? यह भेदभाव क्यों ? जबकि दिये जा रहे आरक्षण में दलितों के 22 प्रतिशत की अपेक्षा ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देकर अग्रता हासिल है।

न्यायप्रिय लोगों को दरकिनार कर कानून तोड़ने वालों को ही दिया जा रहा मन्दिर बनाने का जिम्मा

जिन लोगों ने देश के कानून का आदर करते हुये मुकदमा लड़ा और अपने पूरे समाज के लिए विजय पाई उन्हें तो ट्रस्ट में दरकिनार कर दिया गया है और जिन लोगों ने कानून तोड़ा, गुण्डागर्दी की, ढांचा मन्दिर सहित अनेक मन्दिर तोड़े उन्हें मन्दिर की जिम्मेदारी दी जा रही है। यह तो अन्यायी को प्रोत्साहित करने जैसी बात है ।

उन समस्त पक्षकारों के साथ बहुत बडा अन्याय हुआ है जिन्होंने भगवान् की पूजा आराधना समझकर इस मुकदमे की पैरवी की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने केवल स्कीम बनाने को कहा था ट्रस्ट नहीं

उच्चतमन्यायालय के निर्णय के किसी भी पैराग्राफ़ में केन्द्र सरकार को नया ट्रस्ट बनाने को नहीं कहा गया है । यही नहीं केन्द्र सरकार की पांच फरवरी को प्रकाशित गृहमन्त्रालय की अधिसूचना में भी यह स्वीकार किया गया है कि 'एक स्कीम बनाने' का निर्देश उच्च तम न्यायालय से हुआ है। जब केवल स्कीम बनाने को कहा गया है तो फिर एक सर्वोच्च धर्माचार्यों के ट्रस्ट के उपस्थित होते हुये किसी और ट्रस्ट को बनाने की क्या आवश्यकता थी ?

अधिसूचना के अन्तिम पैरा में यह कथन कि 'पांच फरवरी को माने उसी दिन स्थापित श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र उक्त स्कीम में विनिर्दिष्ट ऐसे निबन्धनों और शर्तों का अनुपालन करने का इच्छुक है' बताता है कि केन्द्र सरकार ने उच्च तम न्यायालय के निर्देशों को किस तरह तोड़-मरोड़कर अपने पक्ष में दिखाने की चेष्टा की है ।

केन्द्र सरकार की स्वेच्छाचारिता और भेदभाव के खिलाफ रामालय न्यास कोर्ट जायेगा

रामालय न्यास का यह मानना है कि केन्द्र सरकार ने उच्चतमन्यायालय के निर्देशों का अनुपालन करने में पारदर्शिता नहीं अपनाई है। ट्रस्टियों की नियुक्ति में स्वेच्छाचारिता की है और दलित आदि शब्दों का उल्लेख कर हिन्दू समाज में भेदभाव किया है। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अपने पक्ष में अनुचित उपयोग किया है और हमारे फण्डामेण्टल और लीगल अधिकारों का हनन किया है। वासुदेवानन्द जी को न्यायालय द्वारा ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य कहे जाने से रोके जाने के बावजूद उस रूप में उद्घोषित कर न्यायालय की अवमानना की है और करोडों हिन्दुओं के दिल को दुखाया और गलत प्रचार किया है। अतः इसके विरुद्ध न्यायालय में जायेंगे। इसके लिये वरिष्ठ अधिवक्ताओं से सम्पर्क किया जा रहा है ।

सरकार बताये कि उसकी योजना क्या है ?

छोटी सी कंपनी भी यदि एक ठेका उठाती है तो प्रस्तावित टेंडरों पर विचार करती है किंतु राम मंदिर का दायित्व देने से पहले रामालय ट्रस्ट पर विचार क्यों नहीं किया गया ? रामालय ट्रस्ट के पास रामलला को टेण्ट से भव्य बाल मंदिर में ले जाने के लिये कार्य चल रहा है,1008 फुट ऊंची विश्व में अद्वितीय भव्य मंदिर निर्माण की उसके पास योजना तैयार है, 1008 किलो स्वर्ण संग्रह और मन्दिर निर्माण के लिये फंडिंग आदि की पूरी योजना है। सरकार बताये कि नया ट्रस्ट मन्दिर की स्वयं योजना बनायेगा या विहिप और संघ के मॉडल पर कार्य करेगा ?

रामालय न्यास के पूज्य धर्माचार्यों से किस मायने में अधिक हैं सरकारी न्यासी ?

रामालय न्यास में चारों पीठों के पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्यगण, जगद्गुरु मध्वाचार्य, जगद्गुरु रामानुजाचार्य, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य, जगद्गुरु वल्लभाचार्य, जगद्गुरु निम्बार्काचार्य, कांची शंकराचार्य मठ के महाराज, तथा तेरहों अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डलेश्वरगण और हिन्दूधर्माचार्य सभा के संयोजक सहित रामजन्मभूमि मन्दिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येन्द्र दास जी हैं । यह विचारणीय है कि सरकारी न्यास के नियुक्त न्यासी किस मायने में इन पूज्य धर्माचार्यों से बेहतर हैं ? इन आचार्यों को शास्त्र और व्यवहार दोनों का गहरा ज्ञान और अभ्यास है । हजारों मन्दिर इन्होंने बनाये और संचालित कर रहे हैं । जहां तक प्रश्न है इनके राजनीतिक लोगों के सम्पर्क सम्बन्ध का तो इनमें से अधिकांश केन्द्र की भाजपा सरकार के ही करीब हैं । बस इतना ही है कि ये आचार्य गरिमा सम्पन्न हैं स्वतन्त्र विचार रखते हैं और ये किसी दल या संस्था के पिट्ठू नहीं हैं और न बन सकते । ये सदा हिन्दू धर्म को सामने रखकर कार्य करते हैं किसी संस्था या दल को ध्यान में रखकर नहीं । पर यह तो इन आचार्यों की अच्छाई है अयोग्यता नहीं । हिन्दू समाज इसी गुण के लिये इनका आदर करता आया है और करता रहेगा और सरकार को भी इनका आदर करना ही होगा ।

अयोध्या के सन्तों का भी किया है अपमान

केन्द्र सरकार ने श्रीरामजन्मभूमि में मन्दिर निर्माण हेतु न्यास स्थापित कर न केवल शीर्ष धर्माचार्यों को अपमानित किया है अपितु अयोध्या में विराजने वाले अनेक सन्त महन्तों का भी अपमान किया है जिन्होंने इस कार्य में अपना जीवन अर्पित कर दिया । पूज्य रसिकपीठाधीश्वर जनमेजय शरण जी, श्री महन्त नृत्यगोपाल दास जी, स्वामी चक्रपाणि जी महाराज और श्रीमहन्त धर्मदास जी आदि इसी कोटि के सन्त हैं ।

 

 

 


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