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पूर्वांचल की 13 सीटों में से 10 सीटों पर कैसे जीती इंडिया गठबंधन, कहां हुई भाजपा से चूंक



 06/Jun/24

Lok Sabha Result : लोकसभा 2024 के नतीजे सामने आ चुके हैं, दो बार की मोदी सरकार इस बार यूपी में इंडिया गठबंधन के राहुल-अखिलेश जोड़ी के सामने कमजोर पड़ गई। खासकर पूर्वांचल की बात करें तो यहां भी इंडिया गठबंधन की ओर से सपा ने ही बाजी मारी है और देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। वाराणसी से पीएम मोदी 152513 वोटों से जीतकर तीसरी बार सांसद बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से वाराणसी पूरे देश की सबसे हॉट सीट थी। वर्ष 2019 में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के ही अजय राय व सपा शालिनी यादव को चार लाख से अधिक वोट से हराया था जो कि इस बार जीत के वोट अंतर में जबरजस्‍त कमी आई है। यहां राहुल गांधी की पदयात्रा, अखिलेश-राहुल की जनसभा, प्रियंका-डिंपल का रोड शी असर डालते दिखे। इंडिया गठबंधन (कांग्रेस) प्रत्याशी अजय राय का स्थानीय लोगों में बराबर बने रहना भी काम आया। नरेंद्र मोदी की जीत में महिलाएं बड़ी फैक्टर रहीं। उन्हें हर वर्ग के मत मिले हैं। रोजगार और अग्निवीर के मुद्दे से युवा जरूर प्रभावित हुए। मिर्जापुर में एनडीए की सहयोगी अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल को जीत के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। 2014 में वह लगभग दो लाख 19 हजार वोटों से जीती थीं। वर्ष 2019 में दो लाख 34 हजार वोटों से जीती थी पर इस बार जीत का अंतर बेहद कम हो गया। तीसरी सीट भदोही से भाजपा प्रत्याशी डॉ. विनोद बिंद ने जीत हासिल की। भदोही में एनडीए प्रत्याशी डॉ. विनोद कुमार बिंद ने शुरू से बढ़त बनाए रखी। मिर्जापुर के मझवां से विधायक रहे डॉ. विनोद को भाजपा ने भदोही के सांसद बने यहां बीजेपी ने रमेश चंद बिंद का टिकट काट कर मैदान में उतारा था। उन्हें बिंद, ब्राह्मण अन्य बैकवर्ड का समर्थन मिला। भाजपा संगठन ने पूरी ताकत लगा दी थी। भाजपा सरकारों का विकास, सुशासन भी काम आया। वहीं विपक्ष के संविधान, आरक्षण और हर गरीब के खाते में 8500 रुपये डालने जैसे नारे काम नहीं आए। पिछड़े वर्ग के वोटरों को इंडिया गठबंधन नहीं जोड़ नहीं पाई।

वाराणसी से सबसे नजदीकी सीट चंदौली पर सबकी नजर रही जहां दो बार चंदौली से सांसद व केंद्रीय मंत्री रहे डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय इस बार हार सपा के वीरेन्‍द्र सिंह से हार गए। जिसकी वजह विकास कार्यों को लेकर नाराजगी, कार्यकर्ताओं की अनदेखी मानी जा रही है। सवर्ण वोट भी इस बार बटे हैं। बसपा से सत्येंद्र मौर्य के आने से मौर्य वोट भी बंट गया। दलित मतदाता भी इस बार भाजपा से दूरी बना लिए। तो वहीं मुस्लिम मतदाता भाजपा को हराने को सपा के पक्ष में एकजुट हो गए। विपक्ष के आरक्षण और संविधान बचाओ के नारे ने भी चंदौली में प्रभाव डाला।

अब बात करते हैं अन्‍य जिलों की जिसमें गाजीपुर से सपा के अफजाल अंसारी ने जीत दर्ज की है। पिछली बार अफजाल असारी बसपा की टिकट पर जीते थे। इस बार वह सपा के उम्मीदवार थे। यहां जातिगत समीकरण हमेशा से हावी रहा है। इस वार भी इस फैक्टर ने अपना काम किया। यादव और मुस्लिम मतदाताओं के साथ दलित वोटरों ने भी अफजाल का सहयोग किया है। अफजाल की सक्रियता और क्षत्रिय मतदाताओं के सहयोग ने भी प्रभाव डाला।

बलिया सीट इस बार भाजपा के हाथ से फिसल गई। वर्ष 2014 और 2019 में यहां भाजपा जीती थी। इस बार वीरेंद्र सिह मस्त का टिकट काटकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया गया था। जिन्‍हें सपा प्रत्याशी सनातन पांडे लगभग 50 हजार मतों से हरा दिया। यहां भी भाजपा के संगठन और कार्यकर्ताओं में एकजुटता नहीं दिखी। प्रत्याशी के साथ तालमेल का भी अभाव रहा। स्थानीय नेताओं का विरोध भी देखने को मिला।

जौनपुर सीट पर भी सपा ने एकतरफा जीत हासिल की यहां सपा प्रत्‍याशी बाबू सिंह कुशवाहा ने जीत हासि�ल की है भाजपा ने कृपाशंकर सिंह को प्रत्याशी बनाया था, जिनकी राजनीति महाराष्ट्र में रहीं। स्थानीय स्तर पर विरोध और नेताओं का चुनाव में रुचि न लेना हार का कारण बना। 2019 के चुनाव में सपा से गठबंधन में वह सीट बसपा ने 80 हजार वोटों से जीती थी। सपा की जीत का अंतर 80 हजार के आसपास है। मुस्लिम, यादव और कुशवाहा वोट एकमुश्त सपा के पक्ष में रहा। भाजपा प्रत्याशी के भितरघात का लाभ सपा को मिला। दलित मतदाता बसपा के साथ रहे।

जौनपुर की दूसरी सीट मछलीशहर सीट सुरक्षित है, यहां सपा प्रत्याशी प्रिया सरोज ने एकतरफा जीत हासिल की है। पिछली बार भाजपा के प्रत्याशी वीपी सरोज महज 181 वोट से जीते थे। तभी से कुछ लोगों में नाराजगी थी, पाच साल तक किसी के दरवाजे पर न जाना, 500 से अधिक लोगों पर एससी-एसटी लगवाने के कारण सवर्ण मतदाताओं का विरोध, दलित मतदाताओं का बिखराव भाजपा की हार का कारण बना। सपा से युवा प्रत्याशी के रूप में प्रिया सरोज की चुनाव मैदान में उतारना सपा के लिए फायदेमंद साबित हुआ।

घोसी सीट पिछली बार बसपा के पास थी। 2019 में सपा-बसपा गठबंधन से अतुल राय ने जीत दर्ज की थी। इस बार भाजपा गठबंधन ने सुभासपा के अरविंद राजभर को मैदान में उतारा था। भाजपा की ओर से गठबंधन के सुभासपा को सीट दिए जाने से भाजपा कार्यकर्ता और नेताओं ने कोई रुचि नहीं दिखाई। भाजपा के कौर वोटर राजपूत, ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहारों में असंतोष होने से सपा को वोट दिया। इसके साथ ही संविधान बचाओं का भी यहां मुद्दा हावी होने के कारण दलित मतदाताओं का भी रुझान सपा की ओर होना रहा।

लालगंज लोकसभा सीट पर भी सपा के दरोगा सरोज ने एकतरफा जीत हासिल की। 2019 के चुनाव में सपा के साथ गठबंधन में यह से अधिक वोटों से जीती थी। इस बार सपा की जीत का अंतर एक लाख के आसपास है। लालगंज सुरक्षित सीट पर दलित मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। सपा के संविधान बचाओ और आरक्षण खत्म करने जैसे मुद्दे यहां काम कर गए। दलित मतदाता सपा की तरफ डायवर्ट हो गए। प्रत्याशी से नाराजगी को लेकर राजपुत और कुछ सवर्ण मतदाताओं ने भी सपा के साथ रहे।

आजमगढ़ लोकसभा सीट पर सपा के धर्मेन्‍द्र यादव को एकतरफा जीत मिली है। इन्‍होंने भाजपा के प्रत्‍याशी दिनेश लाल यादव को हरा दिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन के दौरान भी यह सीट सपा ने दो लाख 59 हजार के अंतर से जीती थी। तब अखिलेश यादव यहां से प्रत्याशी थे। इस बार जीत का अंतर हालाकि कम है। 2022 के उपचुनाव में बसपा प्रत्याशी शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली के कारण सपा को यह सीट गंवानी पड़ी थी। इस बार गुड्डू जमाली को चुनाव से पहले अखिलेश ने सपा में शामिल कर एमएलसी बना दिया जिसका असर चुनाव में साफ दिखा।

राबर्ट्सगंज में भाजपा नेताओं से सवर्णों की नाराजगी हार का कारण बनी है। 2019 में भी यह सीट गठबंधन में अपना दल (एस) के पास थी। भाजपा अपना दल (एस) गठबंधन के उम्मीदवार पकौड़ी लाल कोल ने सपा के भाई लाल को 54 हजार वोटों से हराया था। इस बार अपना दल (एस) ने पकौड़ी कोल का टिकट काटकर उनकी बहू और मिर्जापुर जिले के छानबे (सुरक्षित) से विधायक रिकी कोल को चुनाव मैदान में उतारा। पकौड़ी कोल का विरोध स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ ही सवर्ण वोटर भी कर रहे थे। वहीं संविधान बदलने, आरक्षण खत्म कर देने जैसे मुद्दे भी काफी प्रभावी रहे इंडिया गठबंधन से सपा के प्रत्‍याशी छोटेलाल खरवार ने जीत हासिल किया।


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